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Join NowWomen empowerment in India: जब भी देश के विकास या राष्ट्र निर्माण (Nation Building) की बात होती है, तो अक्सर हम बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स, अर्थव्यवस्था और राजनीति की बात करने लगते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देश की आधी आबादी यानी महिलाओं के बिना क्या यह सब संभव है?
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हाल ही में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित और भारतीय राजनीति के दिग्गज नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने एक बहुत ही गहरी बात कही है। उनका कहना है, “महिलाएं राष्ट्र निर्माण की प्रमुख शक्ति हैं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाए बिना लोकतंत्र पूर्ण नहीं हो सकता।
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सुनने में यह एक साधारण सा वाक्य लग सकता है, लेकिन अगर हम इसके पीछे छिपे संदेश को समझें, तो यह हमारे समाज और राजनीति की पूरी तस्वीर बदल कर रख सकता है। आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि आडवाणी जी के इस विचार के क्या मायने हैं और क्यों महिलाओं के बिना हमारा लोकतंत्र सचमुच अधूरा है।
आडवाणी जी के इस बयान का असली मतलब क्या है?
जब हम ‘लोकतंत्र’ (Democracy) शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले वोट डालने की तस्वीर आती है। लेकिन लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव के दिन लाइन में लगकर वोट देना नहीं है। असली लोकतंत्र तब बनता है, जब नीतियां बनाने में, फैसले लेने में और देश को चलाने में हर वर्ग की बराबर हिस्सेदारी हो।
लालकृष्ण आडवाणी जी का यह बयान हमें याद दिलाता है कि जब तक देश की आधी आबादी (महिलाएं) संसद, विधानसभाओं और नीति-निर्माण के ऊंचे पदों पर पुरुषों के बराबर नहीं बैठतीं, तब तक हम खुद को एक ‘पूर्ण लोकतंत्र’ नहीं कह सकते। एक गाड़ी दो पहियों से चलती है; अगर एक पहिया (पुरुष) तेजी से भागे और दूसरा (महिला) पीछे छूट जाए, तो गाड़ी कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकती।
महिलाओं के बिना अधूरा क्यों है हमारा लोकतंत्र?
ज़रा सोचिए, हमारे देश की आबादी में लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं हैं। तो क्या यह सही है कि उनके भविष्य से जुड़े फैसले सिर्फ पुरुष लें? बिल्कुल नहीं।
जब महिलाएं सिस्टम का हिस्सा बनती हैं, तो वे उन मुद्दों को सामने लाती हैं जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। जैसे— बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, महिलाओं की सुरक्षा और रोजगार के अवसर। एक महिला जब नेता या अधिकारी बनती है, तो उसकी सोच ज़मीनी हकीकत से जुड़ी होती है। इसलिए, जब तक राजनीति और प्रशासन में महिलाओं की संख्या नहीं बढ़ती, तब तक लोकतंत्र का असली फायदा समाज के हर घर तक नहीं पहुंच सकता।
राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका: पंचायत से लेकर स्पेस तक
राष्ट्र निर्माण सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी ताकत का लोहा मनवा रही हैं।
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गांव की पंचायत में: आज गांव की महिला सरपंच घूंघट से बाहर निकलकर अपने गांव में पक्की सड़कें बनवा रही हैं और बेटियों के लिए स्कूल खुलवा रही हैं।
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विज्ञान और तकनीक: इसरो (ISRO) के चंद्रयान और मंगलयान जैसे बड़े मिशन्स के पीछे हमारी महिला वैज्ञानिकों का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
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खेल और सेना: ओलिंपिक में मेडल लाने से लेकर बॉर्डर पर देश की रक्षा करने और फाइटर जेट उड़ाने तक, महिलाएं देश का गौरव बढ़ा रही हैं।
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कॉर्पोरेट और स्टार्टअप्स: आज कई बड़ी कंपनियों की सीईओ महिलाएं हैं और वे अपने दम पर हजारों लोगों को रोजगार दे रही हैं।
यही तो असली राष्ट्र निर्माण है! जब एक महिला शिक्षित और सशक्त होती है, तो वह केवल अपना नहीं, बल्कि पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संवार देती है।
समाज और घरों में क्या बदलने की जरूरत है?
हालांकि, महिलाएं बहुत आगे बढ़ रही हैं, लेकिन अब भी हमें एक समाज के तौर पर बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। आज भी कई घरों में बेटियों की पढ़ाई से ज्यादा उनकी शादी की चिंता की जाती है।
अगर हमें आडवाणी जी के कहे अनुसार एक ‘पूर्ण लोकतंत्र’ बनाना है, तो शुरुआत हमारे अपने घरों से करनी होगी।
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बेटियों को सिर्फ अच्छी पत्नी या बहू बनने की ट्रेनिंग न दें, बल्कि उन्हें लीडर बनने के लिए प्रेरित करें।
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उन्हें अपनी राय रखने और फैसले लेने की आज़ादी दें।
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सुरक्षित माहौल बनाएं ताकि महिलाएं बिना किसी डर के रात-दिन काम कर सकें और आगे बढ़ सकें।
कुल मिलाकर, ‘भारत रत्न’ लालकृष्ण आडवाणी जी का यह संदेश हमारे लिए एक आईना है। महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) सिर्फ एक नारा नहीं होना चाहिए, बल्कि यह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा होना चाहिए। जिस दिन देश के हर छोटे-बड़े फैसले में महिलाओं की आवाज़ को बराबर अहमियत मिलने लगेगी, उसी दिन हमारा लोकतंत्र सही मायनों में पूर्ण और सफल कहलाएगा।









