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Join NowWomen’s Reservation Bill: भारतीय राजनीति में ‘आधी आबादी’ यानी महिलाओं के हक को लेकर एक ऐसा घमासान छिड़ गया है, जिसने दिल्ली से लेकर उत्तराखंड तक की सियासत को गरमा दिया है। महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन (Delimitation) बिल के संसद में लटक जाने के बाद, अब यह लड़ाई सड़कों पर आ गई है। जहाँ एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए विपक्षी दलों को ‘महिला विरोधी’ करार दिया है, वहीं कांग्रेस ने भी इस नैरेटिव को ध्वस्त करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।
उत्तराखंड में कांग्रेस का हल्ला बोल: बीजेपी के दांव का जवाब
हाल ही में उत्तराखंड की राजनीति में उस वक्त उबाल आ गया जब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विधानसभा के बाहर ज़ोरदार प्रदर्शन किया। कांग्रेस की मांग स्पष्ट है— “महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत दिया जाए, इसे भविष्य के वादों और परिसीमन की पेचीदगियों में न उलझाया जाए।
हरीश रावत ने बीजेपी पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यह महिलाओं के साथ एक ‘सुनियोजित साजिश’ है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी ने जानबूझकर आरक्षण नीति को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा है, जबकि वे जानते हैं कि परिसीमन पर अभी कोई राष्ट्रीय सहमति नहीं है। यह केवल इस बिल को लटकाने और महिलाओं को धोखा देने का एक तरीका है।
क्या है असली विवाद? क्यों फंसा है महिला आरक्षण का पेंच?
2023 में जब मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल लेकर आई थी, तो इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया गया था। लेकिन इसमें एक बड़ी शर्त जोड़ दी गई— आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना और उसके बाद सीटों का परिसीमन होगा। विपक्ष का तर्क है कि अगर सरकार की नीयत साफ है, तो वह मौजूदा लोकसभा और विधानसभा सीटों पर ही 33% आरक्षण तुरंत लागू क्यों नहीं करती?
बीजेपी का कहना है कि विपक्ष के अवरोध के कारण बिल पास होने में देरी हुई, जिससे वे जनता के बीच विपक्ष की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ का मानना है कि परिसीमन के जरिए बीजेपी देश का राजनीतिक नक्शा बदलने और दक्षिण भारतीय राज्यों की ताकत कम करने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस की रणनीति: ‘डेलिमिटेशन’ से आरक्षण को अलग करने की मांग
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस महिलाओं के आरक्षण के पूर्ण समर्थन में है, लेकिन वे इसे ‘परिसीमन’ (Delimitation) के जाल से बाहर निकालना चाहते हैं। जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर 2024 के घोषणापत्र का हवाला देते हुए कहा कि हमारा स्टैंड स्थिर है— आरक्षण 2029 से पहले और बिना किसी शर्त के लागू होना चाहिए।
2029 की चुनावी बिसात?
बीजेपी और कांग्रेस के बीच छिड़ा यह ‘शह-मात का खेल’ महज एक कानून की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए वोट बैंक की घेराबंदी है। क्या बीजेपी महिलाओं के बीच कांग्रेस को ‘विलेन’ साबित करने में सफल होगी? या फिर कांग्रेस का ‘साजिश वाला नैरेटिव’ जनता के गले उतरेगा? फिलहाल, उत्तराखंड की सड़कों पर उतरा यह आक्रोश इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और भी गहराने वाला है।










