Chatra Air Ambulance: चतरा एयर एम्बुलेंस हादसे की वो दास्तां जो आपकी रूह कंपा देगी

Published On: February 24, 2026
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Chatra Air Ambulance: चतरा एयर एम्बुलेंस हादसे की वो दास्तां जो आपकी रूह कंपा देगी

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Chatra Air Ambulance: झारखंड के चतरा जिले से एक ऐसी हृदयविदारक खबर सामने आई है जिसने न केवल पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी तार-तार कर दिया है। सिमरिया के घने और दुर्गम जंगलों में जब एक एयर एम्बुलेंस का मलबा मिला, तो उसके साथ ही सात जिंदगियों के वो सुनहरे सपने भी राख हो गए, जिन्हें बुनने के लिए परिवारों ने अपनी पूरी जमा-पूंजी और वजूद दांव पर लगा दिया था।

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यह महज एक ‘विमान दुर्घटना’ (Plane Crash) नहीं है, बल्कि उन सात परिवारों की सामूहिक त्रासदी है, जिनकी दुनिया अब कभी वैसी नहीं रहेगी।

कर्ज की नींव पर खड़े थे सपने: डॉ. विकास की कहानी

इस हादसे में जान गंवाने वाले डॉ. विकास कुमार गुप्ता रांची के सदर अस्पताल में तैनात थे। उनकी कहानी संघर्ष और बलिदान की एक मिसाल थी। बिहार के औरंगाबाद के एक साधारण परिवार से आने वाले डॉ. विकास को डॉक्टर बनाने के लिए उनके पिता बजरंगी प्रसाद ने अपनी पूरी जमीन बेच दी थी।

आज उनकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि एक खालीपन है। वे बताते हैं, “लोग कहते थे इतना कर्ज मत लो, कैसे चुकाओगे? मैंने कहा था कि बेटा डॉक्टर बन जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा।” विकास ने ओडिशा के कटक से एमबीबीएस किया था, लेकिन किसे पता था कि जिस बेटे के लिए पिता ने अपनी जमीन और सुकून बेच दिया, वह खुद मलबे के नीचे हमेशा के लिए सो जाएगा। विकास अपने पीछे सात साल का एक मासूम बेटा छोड़ गए हैं।

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8 लाख का कर्ज और आखिरी उम्मीद: संजय कुमार की त्रासदी

विमान में सवार मरीज संजय कुमार चंदवा के रहने वाले थे। एक छोटे से होटल चलाने वाले संजय की जिंदगी तब बदल गई जब उनके होटल में शॉर्ट सर्किट से आग लग गई। संजय बुरी तरह झुलस गए थे। इलाज के लिए रिश्तेदारों से 7.5 से 8 लाख रुपये का भारी-भरकम कर्ज लेकर एयर एम्बुलेंस बुक की गई थी।

संजय के भाई अजय बताते हैं कि उन्हें उम्मीद थी कि दिल्ली के बड़े अस्पताल में इलाज मिलने से संजय की जान बच जाएगी। लेकिन किस्मत का खेल देखिए, जिस जान को बचाने के लिए परिवार ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, वही जान बीच रास्ते में ही छिन गई।

17 साल का ध्रुव: सेवा की भावना ले डूबी

इस हादसे की सबसे दुखद कहानियों में से एक 17 वर्षीय ध्रुव कुमार की है। सिमडेगा का रहने वाला ध्रुव मोबाइल इंजीनियरिंग में अपना भविष्य देख रहा था। जब उसे पता चला कि उसके मामा संजय बुरी तरह झुलस गए हैं, तो उसने अपनी पढ़ाई छोड़कर उनकी सेवा करने का फैसला किया। वह मामा के साथ दिल्ली जा रहा था, ताकि वहां उनकी देखभाल कर सके। लेकिन वह भी इस हादसे का शिकार हो गया।

हादसे का वो खौफनाक मंजर: 23 मिनट और सब खत्म

जानकारी के अनुसार, एयर एम्बुलेंस ने शाम 7:11 बजे रांची एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी। लेकिन खराब मौसम, तेज हवाओं और कम विजिबिलिटी के कारण विमान रास्ता भटक गया। उड़ान भरने के मात्र 23 मिनट बाद ही एटीसी (ATC) से विमान का संपर्क टूट गया।

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चतरा के करम टॉड़ के पास सिमरिया के जंगलों में विमान क्रैश हो गया। पायलट, को-पायलट और मेडिकल टीम सहित सभी सात लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। जंगल इतना घना था कि रेस्क्यू टीम को घटनास्थल तक पहुंचने के लिए 4 किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ा। जवानों ने अपनी पीठ पर शवों को लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया।

चतरा का यह हादसा हमें याद दिलाता है कि जिंदगी कितनी अनिश्चित है। जहाँ एक ओर तकनीकी विफलता ने सात जानें लीं, वहीं दूसरी ओर उन परिवारों का क्या होगा जो अब कर्ज के बोझ और अपनों के खोने के गम में डूब गए हैं? यह मलबा सिर्फ लोहे के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि उन उम्मीदों की राख है जो कल तक बेहतर भविष्य की उम्मीद कर रही थीं।

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