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Join NowLok Sabha Election Reservation: भारतीय राजनीति में एक बार फिर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। मुद्दा है. ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण कानून। सरकार ने इस अधिनियम में जरूरी संशोधनों को पास कराने के लिए 16 से 18 अप्रैल, 2026 तक संसद का विशेष सत्र बुलाया है। लेकिन सत्र शुरू होने से पहले ही सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच शब्दों के बाण चलने शुरू हो गए हैं। इस पूरे मामले ने तब तूल पकड़ा जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों के सांसदों को पत्र लिखकर इस ऐतिहासिक बिल का समर्थन करने की भावुक अपील की।
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विपक्ष के आरोप और कांग्रेस की ‘चुनावी’ चिंता
प्रधानमंत्री की अपील के जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक कड़ा पत्र लिखा। खरगे का सीधा आरोप है कि सरकार इस महत्वपूर्ण संवेदनशील मुद्दे पर “जल्दबाजी” कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का असल मकसद महिलाओं को सशक्त बनाना नहीं, बल्कि आगामी चुनावों में राजनीतिक लाभ उठाना है। खरगे के इस पत्र ने राजनीतिक गलियारों में यह बहस छेड़ दी है कि क्या महिला आरक्षण वाकई धरातल पर उतरेगा या यह केवल एक चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा।
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किरेन रिजिजू का पलटवार: “देरी हुई तो 2029 भी हाथ से निकल जाएगा”
विपक्ष के इन आरोपों पर अब केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मोर्चा संभाला है। रिजिजू ने मल्लिकार्जुन खरगे को लिखे अपने जवाब में दो टूक कहा कि अगर अभी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिला आरक्षण लागू करना नामुमकिन हो जाएगा। उन्होंने साफ किया कि सरकार की नीयत साफ है और यह समय इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए सबसे उपयुक्त और तार्किक है।
रिजिजू ने अपने पत्र में याद दिलाया कि साल 2023 में जब संसद के दोनों सदनों ने भारी बहुमत से इस अधिनियम को पारित किया था, तो वह देश की करोड़ों महिलाओं की दशकों पुरानी आकांक्षा का परिणाम था। उन्होंने इसे महिलाओं को निर्णय लेने वाली प्रक्रियाओं (Decision Making) में उनका सही स्थान दिलाने की दिशा में एक ‘ऐतिहासिक कदम’ करार दिया।
क्या विपक्ष को अंधेरे में रखा गया? रिजिजू ने खोले गुप्त बैठकों के राज
विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह था कि सरकार ने इस संशोधन को लाने से पहले किसी से राय-मशविरा नहीं किया। इस पर रिजिजू ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि संवाद की प्रक्रिया 16 मार्च, 2026 से ही शुरू कर दी गई थी। बजट सत्र के दौरान व्यक्तिगत स्तर पर नेताओं से बात की गई थी।
इतना ही नहीं, उन्होंने बताया कि सरकार ने समाजवादी पार्टी, डीएमके, टीएमसी (TMC) और एनडीए के घटक दलों सहित कई गैर-एनडीए दलों के साथ कई दौर की बैठकें की हैं। रिजिजू के मुताबिक, पिछले 15 दिनों में कई बड़े नेताओं ने इस बिल को अपना समर्थन भी दे दिया है, जबकि कुछ ने अपने आंतरिक दलों से बातचीत के लिए समय मांगा है।
क्या होगा 16 अप्रैल को?
किरेन रिजिजू ने राज्यसभा को “राज्यों की परिषद” बताते हुए कहा कि इस सत्र के दौरान देश के हर कोने और हर राज्य की महिलाओं की आवाज गूंजेगी। अब गेंद विपक्ष के पाले में है। क्या कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस ‘ऐतिहासिक’ बदलाव का हिस्सा बनेंगे, या विरोध की राजनीति इसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल देगी? 16 से 18 अप्रैल के बीच होने वाला यह सत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की नई इबारत लिख सकता है।









