Second World War : द्वितीय विश्वयुद्ध का कड़वा सच और विंस्टन चर्चिल का गिरता मुखौटा

Published On: February 16, 2026
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Second World War : द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास में जब भी ‘नायकों’ की बात होती है, ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। हमें सिखाया गया है कि चर्चिल ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से न केवल हिटलर को धूल चटाई, बल्कि दुनिया को तबाही से भी बचाया। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है?

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इतिहासकार एलन ऑलपोर्ट (Alan Allport) की नई किताब ‘Advance Britannia: The Epic Story of the Second World War, 1942-1945’ ने इन दावों की नींव हिला दी है। अपनी पिछली चर्चित किताब ‘Britain at Bay’ के इस सीक्वल में ऑलपोर्ट ने उन कड़वी सच्चाइयों को उजागर किया है, जिन्हें अक्सर ‘जीत के जश्न’ के शोर में दबा दिया गया।

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ब्रिटेन: नायक नहीं, महज एक ‘सर्वाइवर’ (Survivor)

एलन ऑलपोर्ट ने अपनी किताब में साफ लिखा है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन कोई ‘नायक’ नहीं था। मित्र देशों (Allies) के गठबंधन में असली दबदबा अमेरिका और सोवियत संघ का था। एलन के अनुसार, ब्रिटेन इस युद्ध में केवल अपना वजूद बचाने के लिए हाथ-पैर मार रहा था। जिसे हम ‘जीत’ कहते हैं, वह असल में ब्रिटिश साम्राज्य का तेजी से होता हुआ पतन था। 1942 की ‘एल अलामीन’ (El Alamein) की जंग ने भले ही ब्रिटिश सेना में जान फूंक दी थी, लेकिन असल रणनीतिक बढ़त रूस और अमेरिका के पास ही थी।

जब रूजवेल्ट ने दी थी ब्रिटेन को धमकी!

किताब में एक चौंकाने वाला खुलासा मित्र देशों के बीच के आपसी तनाव को लेकर है। हमें लगता है कि अमेरिका और ब्रिटेन गहरे दोस्त थे, लेकिन सचाई कुछ और थी। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट (Franklin Roosevelt), चर्चिल की साम्राज्यवादी और ‘पुरानी सोच’ वाली नीतियों से बेहद खफा थे।

ऑलपोर्ट लिखते हैं कि रूजवेल्ट ने यहाँ तक धमकी दे दी थी कि अमेरिका, ब्रिटिश साम्राज्य के कुछ औपनिवेशिक इलाकों (Colonies) पर कब्जा कर लेगा। रूजवेल्ट उपनिवेशवाद के कट्टर विरोधी थे, जबकि चर्चिल दुनिया पर राज करने वाले पुराने ब्रिटिश घमंड को छोड़ने को तैयार नहीं थे।

चर्चिल का दोहरा चरित्र और ‘भारत का काल’

एक तरफ चर्चिल हिटलर की तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र की लड़ाई का ढोंग कर रहे थे, तो दूसरी ओर भारत जैसे उपनिवेशों को आजाद करने के नाम पर उनके हाथ कांपते थे। एलन ऑलपोर्ट ने चर्चिल की साम्राज्यवादी (Imperialist) मानसिकता को बेनकाब किया है। जब द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर था, उसी दौर में भारत का बंगाल भयानक अकाल (Bengal Famine) झेल रहा था। लाखों लोग दाने-दाने को मोहताज होकर मर रहे थे, लेकिन चर्चिल की प्राथमिकता में भारतीय जानों की कोई कीमत नहीं थी। अफ्रीका में भी साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ विद्रोह भड़क रहे थे, जिसे ब्रिटेन कुचलने में लगा था।

घरेलू मोर्चे पर टूटता हुआ देश

यह किताब सिर्फ सीमा की लड़ाई की बात नहीं करती, बल्कि उस दौर के ब्रिटेन के भीतर मची खलबली को भी दर्शाती है। ऑलपोर्ट के अनुसार, युद्ध के दौरान ब्रिटेन में अमीर और गरीब के बीच की खाई और गहरी हो गई थी। राशनिंग का दौर चल रहा था, मजदूरों का संकट खड़ा था और ‘राष्ट्रीय एकता’ का जो नारा चर्चिल देते थे, वह जमीन पर खोखला साबित हो रहा था। ब्रिटिश सरकार की अपनी चिट्ठियों और गोपनीय डायरियों के हवाले से एलन ने बताया है कि ब्रिटेन में उस समय भयंकर आंतरिक तनाव था।

इतिहास के पन्नों से हटी धूल

‘Advance Britannia’ बताती है कि मित्र देशों द्वारा जर्मनी और पश्चिमी यूरोप पर किए गए हमलों से रणनीतिक रूप से जितना फायदा हुआ, उससे कहीं ज्यादा नुकसान मानवीय और नैतिक आधार पर हुआ। ब्रिटेन ने इस जीत की जो कीमत चुकाई, उसे इतिहास के सुनहरे पन्नों में दबा दिया गया। एलन ऑलपोर्ट की यह किताब हमें इतिहास को ‘विजेता’ के चश्मे से नहीं, बल्कि हकीकत के आईने से देखना सिखाती है। विंस्टन चर्चिल निस्संदेह एक कुशल रणनीतिकार थे, लेकिन उनका इतिहास खून से रंगा हुआ था—खासकर उन देशों का खून जिन्हें उन्होंने अपना गुलाम बनाकर रखा था।


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