Delhi High Court: पिता की संपत्ति पर किसका हक? जानें किस बेटी को मिलेगा हिस्सा और कौन रह जाएगी खाली हाथ

Published On: August 17, 2025
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Delhi High Court: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बेटियों के संपत्ति अधिकारों को लेकर एक ऐसा ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो आने वाले समय में एक नजीर बनेगा और पारिवारिक संपत्ति विवादों को एक नई दिशा देगा। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि अविवाहित और विधवा बेटियां (Unmarried and Widowed Daughter) अपने मृत पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने की पूरी हकदार हैं। लेकिन, इस फैसले ने एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है, क्योंकि अदालत ने कहा है कि यह नियम तलाकशुदा बेटियों (Divorced Daughter) पर लागू नहीं होता है।

इस फैसले के पीछे अदालत का तर्क यह है कि एक तलाकशुदा बेटी कानूनी रूप से अपने भरण-पोषण के लिए अपने पूर्व-पति पर निर्भर होती है, जबकि अविवाहित और विधवा बेटियां अपने जीवन-यापन के लिए पूरी तरह से अपने पिता पर आश्रित हो सकती हैं।

तलाकशुदा बेटी क्यों रह गई वंचित?

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक तलाकशुदा महिला द्वारा दायर की गई अपील को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। महिला ने निचली पारिवारिक अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी याचिका खारिज कर दी गई थी। न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि कानूनी तौर पर, एक अविवाहित या विधवा बेटी का अपने परिजनों से भरण-पोषण और संपत्ति में हिस्सा मांगना, एक तलाकशुदा बेटी की तुलना में कहीं अधिक उचित है।

अदालत ने हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (Hindu Adoptions and Maintenance Act, 1956) का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि इस कानून की धारा 21 के तहत केवल अविवाहित और विधवा बेटियों को ही ‘आश्रित’ (dependent) माना जाता है। वहीं, एक तलाकशुदा बेटी अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता (alimony) पाने की कानूनी रूप से हकदार होती है और वह पूरे हक के साथ इसके लिए कानून का सहारा ले सकती है।

मृत पिता की संपत्ति पर किसका दावा कितना मजबूत?

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि भरण-पोषण का अधिकार इस अधिनियम की धारा-21 में परिभाषित रिश्तेदारों की नौ श्रेणियों के लिए ही उपलब्ध है, और इस सूची में ‘तलाकशुदा बेटी’ का कहीं भी जिक्र नहीं है।

यह मामला एक ऐसी महिला का था जिसके पिता की मृत्यु 1999 में हो गई थी। उसके परिवार में अब उसकी मां, एक भाई और दो बहनें हैं। महिला ने अदालत (court) में यह दलील दी थी कि वह भी अपने पिता की कानूनी वारिस है, लेकिन उसे अपने मृत पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं दिया गया है।

क्या था पूरा मामला जिसने इस बहस को जन्म दिया?

याचिकाकर्ता महिला ने अदालत में एक चौंकाने वाला दावा किया। उसने कहा कि उसकी मां और भाई ने उससे वादा किया था कि वे उसे हर महीने ₹45,000 देंगे, बशर्ते वह संपत्ति में अपने हिस्से पर कोई दावा न करे। महिला के अनुसार, उसे नवंबर 2014 तक यह पैसा नियमित रूप से मिलता भी रहा, लेकिन बाद में बंद कर दिया गया।

उसने यह भी बताया कि उसके पति ने सितंबर 2001 में उसे एकतरफा तलाक (ex-parte divorce) दे दिया था, और तब से उसका कोई अता-पता नहीं है। इस दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति के कारण, महिला को अपने पति से कोई गुजारा भत्ता भी नहीं मिल पाया।

कानून नहीं बदला जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून को बदला नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 21 के प्रावधानों को संशोधित नहीं किया जा सकता, चाहे किसी की परिस्थितियां कितनी भी जटिल क्यों न हों।

अदालत ने महिला से कहा कि वह अपने पति से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए उपलब्ध कानूनी रास्तों का पता लगाए और उनका उपयोग करे। न्यायालय के इस फैसले को एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में भरण-पोषण और पैतृक संपत्ति से संबंधित मामलों को गहराई से प्रभावित कर सकता है।

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