Budget 2026: शाम 5 बजे क्यों आता था देश का बजट? •

Published On: January 12, 2026
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Budget 2026: शाम 5 बजे क्यों आता था देश का बजट?

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Budget 2026: जब 1 फरवरी की सुबह 11 बजे देश के वित्त मंत्री संसद में बजट ब्रीफकेस (या अब टैबलेट) के साथ कदम रखते हैं, तो पूरे देश की नजरें टीवी स्क्रीन पर टिकी होती हैं। हमें लगता है कि यह तो हमेशा से ही होता आया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बजट की यह तारीख और समय हमेशा से ऐसे नहीं थे?

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भारतीय बजट के इतिहास में दो ऐसी तारीखें दर्ज हैं, जिन्होंने भारत को अंग्रेजों की ‘मानसिक गुलामी’ से आजाद कराया और देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी। आइए जानते हैं बजट पेश करने के समय और तारीख बदलने के पीछे का वो रोचक इतिहास और रणनीतिक कारण, जो आज भी कई लोगों के लिए एक रहस्य है।

शाम 5 बजे का वो ‘अंधेरा’ और ब्रिटिश कनेक्शन

आज हम सुबह 11 बजे बजट देखते हैं, लेकिन साल 1999 से पहले तक भारत का आम बजट शाम को 5 बजे पेश किया जाता था। क्या आपने कभी सोचा है कि शाम 5 बजे ही क्यों? इसके पीछे कोई शुभ मुहूर्त नहीं, बल्कि एक औपनिवेशिक मजबूरी थी।

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दरअसल, ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का बजट लंदन के समय के अनुसार तय होता था। जब भारत में शाम के 5 बजते थे, तब लंदन में सुबह के 11 बज रहे होते थे। ब्रिटिश सांसद अपने समय के अनुसार सुबह 11 बजे भारत का बजट आराम से सुनना चाहते थे, इसलिए भारत में इसे शाम को पेश किया जाता था। आजादी के दशकों बाद तक हम इसी पुरानी परंपरा को ढोते रहे।

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बदलाव का नायक: साल 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस ‘गुलामी की जंजीर’ को तोड़ने का फैसला किया। उन्होंने बजट का समय बदलकर सुबह 11 बजे कर दिया। उनका तर्क बहुत सीधा और तार्किक था—बजट अगर दिन की शुरुआत में आएगा, तो सांसदों, विशेषज्ञों और आम जनता को इसे समझने और इस पर चर्चा करने के लिए पूरा दिन मिलेगा।

28 फरवरी से 1 फरवरी: क्यों बदली गई तारीख?

बजट के इतिहास में दूसरा बड़ा बदलाव साल 2017 में हुआ। 2017 से पहले तक बजट हमेशा फरवरी के आखिरी कार्य दिवस (28 या 29 फरवरी) को पेश किया जाता था। अंग्रेजों का मानना था कि 1 अप्रैल से नए वित्तीय वर्ष को लागू करने के लिए एक महीने का समय काफी है।

लेकिन जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था बड़ी और जटिल होती गई, यह एक महीने का समय कम पड़ने लगा। मंत्रालयों और राज्य सरकारों को पैसा मिलने में देरी होती थी, जिससे मानसून आने से पहले बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के काम शुरू नहीं हो पाते थे। कई बार तो बजट की फाइलें दफ्तरों के चक्कर ही काटती रह जाती थीं।

अरुण जेटली का मास्टरस्ट्रोक: साल 2017 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस समस्या का समाधान निकाला। उन्होंने बजट को 1 फरवरी को पेश करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इससे सरकार को नए वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल) से पहले करीब दो महीने का समय मिलने लगा। अब विभागों के पास अपनी योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने और फंड अलॉट करने के लिए पर्याप्त समय होता है, जिससे देश के विकास की गति धीमी नहीं पड़ती।

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सिर्फ समय नहीं, बहुत कुछ बदला

बजट की तारीख और समय बदलने के साथ ही सरकार ने एक और बड़ा बदलाव किया था—रेल बजट का आम बजट में विलय। 92 साल पुरानी परंपरा को खत्म करते हुए रेल बजट को आम बजट का हिस्सा बना दिया गया, जिससे देश के संसाधनों का बेहतर प्रबंधन संभव हो सका।

आधुनिक भारत की बदलती सोच

बजट की तारीख और समय में हुए ये बदलाव महज प्रशासनिक फेरबदल नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का प्रतीक हैं कि भारत अब अपनी जरूरतों के हिसाब से फैसले ले रहा है। यह ‘न्यू इंडिया’ की वो तस्वीर है जहाँ हम अपनी जड़ों से जुड़े हैं लेकिन पुरानी और बोझिल परंपराओं को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का दम रखते हैं। अगली बार जब आप 1 फरवरी को बजट देखें, तो याद रखिएगा कि यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक आजाद और आधुनिक राष्ट्र की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।


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