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Join NowUP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति अपनी अनिश्चितताओं और चौंकाने वाले मोड़ों के लिए जानी जाती है। 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। यूपी तक (UP Tak) के खास शो ‘आज का यूपी’ में राज्य की तीन ऐसी बड़ी खबरों का विश्लेषण किया गया है, जिन्होंने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। चाहे वह अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) का निषाद कार्ड हो या राजा भैया और बृजभूषण शरण सिंह की रेसकोर्स वाली मुलाकात, हर घटना के पीछे एक गहरा राजनीतिक संदेश छिपा है।
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1. अखिलेश यादव का मास्टरस्ट्रोक: फूलन देवी की विरासत और रुक्मणी देवी निषाद की एंट्री
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक ऐसा दांव खेला है जिसने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों, खासकर संजय निषाद की नींद उड़ा दी है। सपा ने रुक्मणी देवी निषाद को ‘समाजवादी महिला सभा’ का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है।
कौन हैं रुक्मणी देवी निषाद?
रुक्मणी देवी कोई साधारण नाम नहीं हैं, बल्कि वे ‘दस्यु सुंदरी’ और पूर्व सांसद फूलन देवी की सगी बड़ी बहन हैं। जब फूलन देवी बीहड़ों में थीं, तब रुक्मणी ही वह कड़ी थीं जो परिवार और फूलन के बीच सेतु का काम करती थीं। अखिलेश यादव ने रुक्मणी देवी को यह जिम्मेदारी देकर सीधे तौर पर निषाद समाज की संवेदनाओं को छुआ है।
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2027 का सियासी समीकरण और PDA फार्मूला
मैनपुरी उपचुनाव के दौरान रुक्मणी देवी की सक्रियता ने डिंपल यादव की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। अब उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देकर अखिलेश यादव अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को और मजबूत कर रहे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब एनडीए के सहयोगी डॉ. संजय निषाद आरक्षण के मुद्दे पर भावुक होकर अपनी ही सरकार को घेरते नजर आ रहे हैं। सपा की कोशिश है कि फूलन देवी की विरासत के सहारे निषाद, मल्लाह और कश्यप वोटों को अपने पाले में किया जाए।
2. दिल्ली रेसकोर्स की वो तस्वीर: राजा भैया और बृजभूषण के बीच ‘ऑल इज वेल’
पिछले कुछ हफ्तों से यूपी की राजनीति में एक बड़ी अफवाह उड़ रही थी कि ठाकुर समाज के दो दिग्गज चेहरे—कुंडा के विधायक राजा भैया (Raghuraj Pratap Singh) और बृजभूषण शरण सिंह—के बीच दूरियां बढ़ गई हैं। चर्चा तब तेज हुई जब एक बड़े धार्मिक आयोजन में राजा भैया शामिल नहीं हुए थे।
अफवाहों पर लगा विराम
लेकिन हाल ही में दिल्ली के रेसकोर्स से आई एक तस्वीर और वीडियो ने विरोधियों के मुंह बंद कर दिए हैं। हरियाणा के एक आयोजक द्वारा आयोजित घुड़दौड़ प्रतियोगिता में ये दोनों नेता एक साथ मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए।
डेढ़ घंटे की मुलाकात के मायने
दोनों ही नेताओं को घोड़ों और खेलों का जबरदस्त शौक है। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने लगभग डेढ़ घंटे तक लंबी बातचीत की। वीडियो में उनकी केमिस्ट्री साफ इशारा कर रही है कि उनके बीच कोई मतभेद नहीं है। यूपी की ठाकुर राजनीति में इन दोनों का कद बहुत बड़ा है, और इनका एक साथ दिखना आने वाले चुनावों में समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
3. निषाद राजनीति में मची खींचतान: बीजेपी के लिए खतरे की घंटी?
2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने यह साफ कर दिया था कि निषाद बहुल सीटों पर बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ा है। आरक्षण के वादे पर अभी तक ठोस कार्रवाई न होने से निषाद समाज के भीतर एक मूक नाराजगी देखी जा रही है।
संजय निषाद की दुविधा
निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद आजकल अपनी जनसभाओं में भावुक हो रहे हैं। वे जानते हैं कि अगर आरक्षण का मुद्दा नहीं सुलझा, तो अखिलेश यादव का ‘रुक्मणी कार्ड’ उनके वोटबैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है। समाजवादी पार्टी ने रुक्मणी देवी को आगे कर यह संदेश दिया है कि वे केवल वोट की राजनीति नहीं करते, बल्कि फूलन देवी के संघर्षों का सम्मान भी करते हैं।
क्या 2027 की पटकथा लिखी जा चुकी है?
अखिलेश यादव की रणनीति अब केवल मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण तक सीमित नहीं है। वे गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने के लिए प्रतीकों और विरासत का सहारा ले रहे हैं। दूसरी ओर, राजा भैया और बृजभूषण शरण सिंह की नजदीकी यह संकेत दे रही है कि सत्ता के खेल में पुराने खिलाड़ी अपनी ताकत को एकजुट रख रहे हैं।
यूपी की राजनीति अब उस दौर में पहुँच चुकी है जहाँ हर एक नियुक्ति और हर एक मुलाकात के पीछे सत्ता की चाबी छिपी है। देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी अखिलेश के इस ‘फूलन दांव’ का क्या काट निकालती है।










