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Join Nowबिहार का नाम अक्सर खेती-किसानी या आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के लिए लिया जाता है, लेकिन अब यहां की बेटियां तकनीक और रोबोटिक्स (Robotics) की दुनिया में भी झंडे गाड़ रही हैं। उत्तर बिहार के दरभंगा जिले से एक ऐसी प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यहां के सरकारी आईटीआई (ITI) की छात्राओं ने अपनी सूझबूझ और मेहनत से ऐसे रोबोट तैयार किए हैं, जो न केवल भारी वेल्डिंग का काम कर सकते हैं, बल्कि डिलीवरी बॉय की तरह सामान भी पहुंचा सकते हैं।
यह कहानी सिर्फ एक आविष्कार की नहीं है, बल्कि उन रूढ़ियों को तोड़ने की है जो कहती हैं कि लड़कियां भारी मशीनों और कोडिंग की दुनिया में सफल नहीं हो सकतीं। दरभंगा की इन बेटियों ने साबित कर दिया है कि अगर सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो बिहार के छोटे शहरों से भी वैश्विक स्तर के इनोवेशन निकल सकते हैं।
1. तकनीक और जज्बा: कैसे हुआ यह चमत्कार?
दरभंगा महिला आईटीआई की छात्राओं ने जब रोबोट बनाने का फैसला किया, तो उनके पास संसाधन सीमित थे, लेकिन उनके सपने बड़े थे। शिक्षकों के मार्गदर्शन में इन छात्राओं ने कोडिंग, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और मैकेनिकल डिजाइनिंग की बारीकियों को सीखा।
छात्राओं ने बताया कि उन्होंने देखा कि कैसे कारखानों में वेल्डिंग के दौरान इंसानों की जान को खतरा रहता है और जहरीली गैसों से स्वास्थ्य खराब होता है। इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए उन्होंने एक ‘वेल्डिंग रोबोट’ (Welding Robot) का मॉडल तैयार किया। यह रोबोट रिमोट या प्री-प्रोग्राम्ड कमांड के जरिए सटीकता से वेल्डिंग कर सकता है, जिससे इंसानी जोखिम शून्य हो जाता है। इसके अलावा, उन्होंने एक ‘डिलीवरी रोबोट’ भी बनाया है जो अस्पतालों या कार्यालयों में दवाइयां और फाइलें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा सकता है।
2. वेल्डिंग से लेकर डिलीवरी तक: ये रोबोट क्या-क्या कर सकते हैं?
छात्राओं द्वारा विकसित किए गए ये रोबोट कई मायनों में खास हैं। आमतौर पर औद्योगिक रोबोटों की कीमत लाखों में होती है, लेकिन दरभंगा की इन छात्राओं ने इन्हें बहुत ही कम लागत में तैयार किया है।
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सटीक वेल्डिंग: वेल्डिंग रोबोट न केवल लोहे को जोड़ने का काम करता है, बल्कि यह उन कोनों तक भी पहुंच सकता है जहां इंसानी हाथ पहुंचना मुश्किल होता है।
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स्मार्ट डिलीवरी: डिलीवरी रोबोट में लगे सेंसर्स उसे बाधाओं (Obstacles) से बचने में मदद करते हैं। यह रोबोट किसी होटल में खाना परोसने या अस्पताल के वार्ड में मरीजों को दवा देने के लिए डिजाइन किया गया है।
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लो-कॉस्ट मॉडल: इन रोबोट्स में इस्तेमाल किए गए पुर्जे स्थानीय बाजार से और कुछ कबाड़ के सामान से भी लिए गए हैं, ताकि इसकी लागत कम रहे और इसे छोटे उद्योगों (MSMEs) के लिए सुलभ बनाया जा सके।
3. बिहार की बदलती तस्वीर: हुनर को मिल रही नई उड़ान
दरभंगा आईटीआई की यह सफलता बिहार की बदलती तस्वीर को बयां करती है। राज्य सरकार अब तकनीकी शिक्षा (Technical Education) पर जोर दे रही है, ताकि यहां के युवा सिर्फ नौकरी ढूंढने वाले नहीं बल्कि नौकरी देने वाले (Entrepreneurs) बनें। इन छात्राओं के प्रोजेक्ट को जिला स्तर पर और तकनीकी मेलों में काफी सराहना मिल रही है।
इन छात्राओं का कहना है कि वे इन रोबोट्स को और भी एडवांस बनाना चाहती हैं ताकि इन्हें असल इंडस्ट्री में इस्तेमाल किया जा सके। यदि इन छात्राओं को स्टार्टअप (Startup) फंड या सरकारी मदद मिलती है, तो वे दरभंगा में ही रोबोटिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू करने का सपना देखती हैं। यह आविष्कार उन सभी लड़कियों के लिए एक मिसाल है जो विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में करियर बनाना चाहती हैं।
दरभंगा की बेटियों ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या महंगी यूनिवर्सिटी की मोहताज नहीं होती। उनकी यह कामयाबी दिखाती है कि बिहार की मिट्टी में टैलेंट की कमी नहीं है, बस उसे सही तराशने की जरूरत है। आज वेल्डिंग और डिलीवरी रोबोट बनाने वाली ये छात्राएं कल भारत की बड़ी टेक कंपनियों का नेतृत्व कर सकती हैं।
FAQ
छात्राओं ने मुख्य रूप से दो तरह के रोबोट बनाए हैं: एक वेल्डिंग रोबोट जो औद्योगिक उपयोग के लिए है, और दूसरा डिलीवरी रोबोट जो अस्पतालों या ऑफिस में सामान पहुंचाने के काम आता है।
2. इन रोबोट्स को बनाने में लगभग कितना खर्च आया?
छात्राओं के मुताबिक, उन्होंने इसे बहुत ही कम बजट में तैयार किया है। जहां औद्योगिक रोबोट लाखों में आते हैं, वहीं इनके प्रोटोटाइप मॉडल कुछ हजार रुपयों के खर्च में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामानों से तैयार किए गए हैं।
3. क्या ये रोबोट असल काम के लिए तैयार हैं?
वर्तमान में ये रोबोट ‘प्रोटोटाइप’ या वर्किंग मॉडल के रूप में हैं। इन्हें बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने के लिए थोड़े और परिष्करण (Refinement) और निवेश की आवश्यकता है, जिसके लिए छात्राएं और संस्थान प्रयासरत हैं।


