उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों विशेषकर बिजनौर और मुरादाबाद में तेंदुओं के बार-बार रिहायशी इलाकों और गन्ने के खेतों में दिखने और उनके हमलों के कारण ग्रामीणों और किसानों में भारी दहशत का माहौल है। सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में लगातार बढ़ रहे इंसान-जानवर टकराव (ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट) को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वीकार किया है कि राज्य में अब तक मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण 4,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जिसके बाद सरकार ने इस संकट को रोकने के लिए कई बड़े और तकनीकी कदम उठाए हैं।
गन्ने के खेत बने तेंदुओं के ठिकाने, दहशत में काम करने को मजबूर हैं किसान
एनडीटीवी के मोहम्मद साक़िब मज़ीद की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश का उत्तर-पश्चिमी इलाका उत्तराखंड की सीमा साझा करता है, जिसके अंतर्गत सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली और पीलीभीत जैसे जिले आते हैं। इस बेल्ट में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है और ये गन्ने के खेत तेंदुओं के लिए सबसे पसंदीदा ठिकाने बन गए हैं। बिजनौर के किरतपुर ब्लॉक के गन्ना किसान उत्कर्ष चौहान बताते हैं, "तेंदुओं की वजह से खेतों की तरफ़ जाना मुश्किल हो जाता है। हम खेतों को ढंग से साफ़ नहीं कर पाते। जब भी खेत में जाते हैं, दो-चार लोग साथ जाते हैं।"
वहीं, मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा तहसील के लालपुर गोसाईं गांव के गन्ना किसान सज्जाद हुसैन ने बताया, "हम जब खेत में होते हैं, तो हमेशा डर बना रहता है कि कहीं अचानक तेंदुआ न आ जाए। इसलिए हम जब खेत की तरफ आते हैं, तो अपने बचाव के लिए बर्छी, डंडे और दरांत अपने साथ लाते हैं।"
रिहायशी इलाकों में जंगली जानवरों के आने की मुख्य वजहें
जंगली जानवरों के रिहायशी और खेतिहर इलाकों में बार-बार आने के पीछे विशेषज्ञों ने कई कारण बताए हैं। रिटायर्ड आईएफएस (IFS) अधिकारी मोहम्मद एहसान का कहना है कि तेंदुए बहुत ही बहुमुखी स्वभाव के होते हैं और वे आमतौर पर जंगलों के किनारों पर स्थित झाड़ियों में रहते हैं। लेकिन जंगलों के लगातार सिकुड़ने से उनके प्राकृतिक शिकार धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं, जिससे शिकार और शिकारी के बीच का संतुलन (प्रे एंड प्रीडेटर रिलेशनशिप) कमजोर हो गया है। इसके अलावा तेंदुए अक्सर पानी की तलाश में या किसी शिकार का पीछा करते हुए रास्ता भटककर गांवों में आ जाते हैं।
वहीं, आईआईएसईआर (IISER) पुणे में जीव विज्ञान के प्रोफेसर मिलिंद वाटवे का कहना है कि यह समस्या केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश में बढ़ रही है। उनका तर्क है कि जंगलों के आसपास हमेशा से खेती होती रही है और जानवर भी वहीं रहते थे, लेकिन अब जानवरों के मन से मनुष्यों का डर बिल्कुल समाप्त हो चुका है, क्योंकि देश में कई वर्षों से शिकार पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस वजह से खेतों की रखवाली करना अब बहुत अधिक कठिन हो गया है।
उत्तर प्रदेश में 23 साल में 2,095 वर्ग किलोमीटर घट गया संरक्षित वन क्षेत्र
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 'स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट' (SOFR) के अनुसार, पिछले 23 वर्षों में उत्तर प्रदेश में संरक्षित वनों (प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट) के क्षेत्र में भारी गिरावट आई है। SOFR 2001 और SOFR 2023 की तुलनात्मक रिपोर्ट से पता चलता है कि राज्य में संरक्षित वन क्षेत्र 2,095 वर्ग किलोमीटर कम हुआ है। 23 साल पहले जो संरक्षित वन क्षेत्र 2,425 वर्ग किलोमीटर था, वह घटकर अब मात्र 330 वर्ग किलोमीटर रह गया है।
तेंदुओं के गन्ने के खेतों में बसने के पीछे एक और बड़ी वजह सामने आई है। गन्ने के ऊंचे पौधे तेंदुओं को छिपने के लिए प्राकृतिक लंबी घास जैसी बेहतरीन जगह देते हैं। इसके अतिरिक्त, पास के रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्रों में बाघों (Tigers) की बढ़ती आबादी कमजोर तेंदुओं को बाहर धकेल देती है, क्योंकि बाघ अधिक ताकतवर और आक्रामक होते हैं। इस स्थिति में तेंदुए जंगलों के मुहाने पर बसे गन्ने के खेतों को अपना नया सुरक्षित ठिकाना बना लेते हैं, जहाँ उन्हें इंसानी बस्तियों के पालतू जानवर (कुत्ते, बकरी आदि) आसानी से शिकार के रूप में मिल जाते हैं। 'भारत में तेंदुओं की स्थिति 2022' की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में तेंदुओं की संख्या साल 2018 के 316 से बढ़कर साल 2022 में 371 हो गई है।
टकराव रोकने के लिए सरकार की रणनीति और आपदा मुआवजा नीति
इस खूनी संघर्ष को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने कई ठोस कदम उठाए हैं। लखनऊ में 'उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण' के नए मुख्यालय भवन के उद्घाटन अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बताया था कि इंसानों और जानवरों के बीच के इस टकराव में अब तक 4,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। उन्होंने इस क्षति को कम करने के लिए तकनीक के उपयोग और लोगों में जागरूकता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया।
5 अगस्त 2026 को दिल्ली में हुई केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की बैठक में उत्तर प्रदेश सरकार ने रैपिड रिस्पॉन्स टीमें, 4 रेस्क्यू सेंटर, सोलर फेंसिंग, अर्ली वार्निंग सिस्टम और वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाने जैसे अपने सफल प्रयोगों को साझा किया था।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अक्टूबर 2018 में मानव-वन्यजीव टकराव को 'राज्य-घोषित आपदा' का दर्जा दिया था, जिससे ऐसी घटनाओं को 'राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष' (SDRF) के दायरे में लाया गया। इसके तहत हमले में मौत होने पर पीड़ित परिवार को 5 लाख रुपये की सहायता राशि और घायल होने पर नियमानुसार मुआवजा दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी नवंबर 2025 में सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि वे इस टकराव को 'प्राकृतिक आपदा' का दर्जा देकर पीड़ित परिवारों को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने पर गंभीरता से विचार करें। वहीं, प्रोफेसर मिलिंद वाटवे का यह भी सुझाव है कि इस संघर्ष को कम करने और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए एक सीमित स्तर तक वन्यजीवों के शिकार (हंटिंग) की अनुमति वापस दी जानी चाहिए।
FAQ:
Q1: उत्तर प्रदेश के बिजनौर और मुरादाबाद जिलों में तेंदुए गन्ने के खेतों को अपना ठिकाना क्यों बना रहे हैं?
A1: गन्ने के ऊंचे पौधे तेंदुओं को छिपने के लिए प्राकृतिक लंबी घास जैसी बेहतरीन जगह देते हैं। इसके अलावा, पास के जंगलों में बाघों (Tigers) की बढ़ती आबादी कमजोर तेंदुओं को बाहर धकेल देती है, जिससे वे बस्तियों के पास स्थित गन्ने के खेतों को अपना नया आशियाना बना लेते हैं।
Q2: पिछले 23 वर्षों में उत्तर प्रदेश के वन क्षेत्र में क्या महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किया गया है?
A2: 'स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट' (SOFR) के अनुसार, पिछले 23 वर्षों में उत्तर प्रदेश में संरक्षित वन क्षेत्र में भारी गिरावट आई है। यह क्षेत्र साल 2001 के 2,425 वर्ग किलोमीटर से 2,095 वर्ग किलोमीटर घटकर साल 2023 में मात्र 330 वर्ग किलोमीटर रह गया है।
Q3: मानव-वन्यजीव टकराव से प्रभावित लोगों को उत्तर प्रदेश सरकार किस प्रकार की वित्तीय सहायता देती है?
A3: उत्तर प्रदेश सरकार ने इस टकराव को 'राज्य-घोषित आपदा' का दर्जा दिया है, जिससे इसे 'राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष' (SDRF) के दायरे में लाया गया है। इसके तहत वन्यजीवों के हमले में मौत होने पर पीड़ित परिवार को 5 लाख रुपये की सहायता राशि और घायल होने पर नियमानुसार मुआवजा दिया जाता है।



