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भारत की उन्नति में जंजीर है जाति आधारित आरक्षण

 

 

 

डेस्क। भारत में जातिगत आरक्षण जिसका गुलाम भारत से लेकर आज के आजाद राम राज्य से गहरा नाता रहा है। जाति आरक्षण का राजनिति से सम्बन्ध काफी गहरा बताया जाता है। राजनिति और जाति दोनों इतने प्रथक होकर भी समान प्रतीत होते हैं कि इसको अलग करना दुध से पानी निकालने के बराबर है। जाति भारत में किसी के लिए प्रताड़ना तो किसी के लिए गौरव का विषय रही है। आरक्षण का प्रारूप भारत में आजादी से पहले कुछ और एवं आज कुछ और बन चुका है। जातिगत आरक्षण की दुर्गति का कारण भी राजनीति को ही माना जाता है। भारत की राजनीति की दुर्दशा के साथ ही जातिगत आरक्षण भी जर्जर हो चुका है।

भारत के संविधान निर्माताओं ने जातिगत आरक्षण को समान समाज की आधारशिला की नींव बताया था। वैसे तो जाति भेदभाव और असमानता की जाननी रही है और आरक्षण को इसी वर्ग आधारित भेदभाव को ख़त्म करने के लिए लाया गया था।

क्यों लाया गया था आरक्षण

भारत के संविधान निर्माताओं ने ये माना था कि वर्गों के आधार पर समाजिक अन्याय को मिटाने के लिए और SC/ST जातियों को शिक्षा एवं नौकरी के क्षेत्र में वरीयता देने का काम आरक्षण द्वारा होगा।

आरक्षण का इतिहास इतना पुराना

वैसे तो आरक्षण का इतिहास आजादी से भी पुराना है। भारत में आरक्षण व्यवस्था की शुरुआत इससे काफी पहले हुई थी। आज से 141 साल पहले और आजादी से 65 साल पहले भारत में आरक्षण की नींव रखी गई थी। बता दें 19वीं सदी के महान भारतीय विचारक, समाज सेवी एवं लेखक ज्योतिराव गोविंदराव फुले ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरी नौकरियों में सभी के लिए आरक्षण-प्रतिनिधित्व करने की मांग करी थी।

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साल के साथ जानिए आरक्षण ने कैसे जमाएं भारत में अपने पैर

1882 – हण्टर आयोग की बना। महात्मा ज्योतिराव फुले ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की माँग रखी।

1891- त्रावणकोर के सामन्ती रियासत में 1891 के आरम्भ में सार्वजनिक सेवा में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी करके विदेशियों की भर्ती करने के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। जिसके साथ ही सरकारी नौकरियों में आरक्षण की माँग करी गयी।

1901- महाराष्ट्र के सामन्ती रियासत एवं कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण को शुरू किया गया। सामन्ती बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में आरक्षण पहले से ही लागू थे।

Reservation जाति आधारित आरक्षण

1908- अंग्रेजों के द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था उनके लिए आरक्षण को शुरू किया गया।

1909 – भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण का प्रावधान था।

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1919- इस साल मोंटागु-चेम्सफोर्ड सुधारों को शुरु किया गया।

1919 – भारत सरकार अधिनियम में भी आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1921 – मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत का आरक्षण रखा गया था।

1935 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया जिसे पूना समझौता बोला जाता है, जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र को आवंटित किया गया है।

1935- भारत सरकार अधिनियम 1935 में भी आरक्षण का प्रावधान करा गया।

1942 – इस साल बी आर अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना करी। साथ ही उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग करी।

1946 भारत में कैबिनेट मिशन के साथ कई सिफारिशों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव दिया गया।

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1947 में भारत को स्वतन्त्रता मिली। डॉ॰ अम्बेडकर को संविधान भारतीय के लिए मसौदा समिति का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया। भारतीय संविधान ने केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में कई विशेष धाराएँ रखी गयी हैं।

इसके साथ ही 10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए भी अलग से निर्वाचन क्षेत्र को आवंटित किया गया हैं। (हर दस साल के बाद सांविधानिक संशोधन के जरिए इन्हें बढ़ा दिया गया है)।

1947-1950 – संविधान सभा में बहस हुई।

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26/01/1950- भारत का संविधान लागू किया गया।

1953 – सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग को स्थापित किया गया था। जहां तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का सम्बन्ध है तो रिपोर्ट को स्वीकार किया गया। साथ ही अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी (OBC)) वर्ग के लिए आरक्षण की सभी सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया गया।

1956- काका कालेलकर की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचियों में संशोधन भी किया गया।

1976- अनुसूचियों में पुनः संशोधन किया गया।

1979 – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित किया गया था। आयोग के पास उपजाति, जो अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी (OBC)) कहलाती है, का कोई सटीक आँकड़ा मौजूद नहीं था। ओबीसी की 52% आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1930 की जनगणना के आँकड़े का इस्तेमाल करते हुए, पिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया है।

1980 – आयोग ने एक रिपोर्ट में पेश की और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए 22% से 49.5% वृद्धि करने की सिफारिश करी। 2006 के अनुसार पिछड़ी जातियों की सूची में जातियों की संख्या 3743 तक पहुँच चुकी है, जो मण्डल आयोग द्वारा तैयार समुदाय सूची में 60% की वृद्धि भी है।

1990 मण्डल आयोग की सिफारिशें विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया था। साथ ही छात्र संगठनों ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू कर दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह की कोशिश भी करी।

1991- नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10% का आरक्षण शुरू किया।

1992- इन्दिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उपजाति के लिए आरक्षण को सही करार दिया था। आरक्षण और न्यायपालिका अनुभाग को भी देखें।

1995- संसद ने 77वें सांविधानिक संशोधन द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पदोन्नति आरक्षण का समर्थन करते हुए अनुच्छेद 16(4A) को जोड़ा। बाद में आगे भी 85वें संशोधन द्वारा इसमें अनुवर्ती वरिष्ठता को शामिल किया गया था। जो ज्येष्ठता का नियम पर आधारित भी है।

1998- केन्द्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समुदायों की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया था। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण का आँकड़ा 32% का है l जनगणना के आँकड़ों के साथ समझौतावादी पक्षपातपूर्ण राजनीति के कारण अन्य पिछड़े वर्ग की सटीक संख्या को लेकर भारत में काफी बहस भी लगी रहती है। आमतौर पर इसे आकार में बड़े होने का अनुमान लगाया गया है, पर यह या तो मण्डल आयोग द्वारा या और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा दिए गए आँकड़े से कम भी है। मण्डल आयोग ने आँकड़े में जोड़-तोड़ करने की आलोचना करी है। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने ये संकेत भी दिया कि बहुत सारे क्षेत्रों में ओबीसी (OBC) की स्थिति की तुलना अगड़ी जाति से भी करी जा सकती है।

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12 अगस्त 2005- उच्चतम न्यायालय ने पी. ए. इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में 12 अगस्त 2005 को 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से ये फैसला सुनाते हुए घोषित की थी कि राज्य पेशेवर कॉलेजों समेत सहायता प्राप्त कॉलेजों में अपनी आरक्षण नीति को अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक पर बिल्कुल भी नहीं थोप सकते हैं।

2005- निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन को भी लाया गया। इसने अगस्त 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को प्रभावी रूप से उलट दिया गया था।

2006- सर्वोच्च न्यायालय के सांविधानिक पीठ में एम. नागराज और अन्य बनाम यूनियन बैंक और अन्य के मामले में सांविधानिक वैधता की धारा 16(4) (ए), 16(4) (बी) और धारा 335 के प्रावधान को भी सही बताया था।

2006- से केन्द्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण भी शुरू हुआ।।कुल आरक्षण 49.5% तक चला और हाल के विकास भी देखें हैं।

2007- केन्द्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी (OBC) आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगन भी दे दिया।

2008-भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल 2008 को सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27% ओबीसी (OBC) कोटा शुरू करने के लिए सरकारी कदम को भी सही ठहराया है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपनी पूर्व स्थिति को दोहराते हुए ये बोला है कि “मलाईदार परत” को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। क्या आरक्षण के निजी संस्थानों आरक्षण की गुंजाइश बनायी जा सकती है, साथ ही सर्वोच्च न्यायालय इस सवाल का जवाब देने में यह भी कहते हुए कतरा गया कि निजी संस्थानों में आरक्षण कानून बनने पर ही इस मुद्दे पर निर्णय लिया जा सकेगा।

2022-जनहित अभियान बनाम भारत संघ रिट याचिका (सिविल) संख्या (एस) में 3:2 के फैसले से भारत का सर्वोच्च न्यायालय है। 55 के 2019, ने कानूनी मंजूरी प्रदान करने के लिए किए भी गए 103 वें संवैधानिक संशोधन की वैधता को बरकरार रखा, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में प्रवेश के लिए अनारक्षित वर्गों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान भी किया है। ये भी कहा कि कोटा पर 50% की सीमा नहीं है साथ ही आर्थिक आधार पर हिंसात्मक और सकारात्मक कार्रवाई जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने में एक लंबा रास्ता तय कर सकती है। वहीं इस संवैधानिक संशोधन ने केंद्रीय संस्थानों में कुल आरक्षण को 59.50% भी कर दिया है।

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