सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों को चार साल की दुष्कर्म पीड़िता बच्ची के पिता को कुल 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का शुक्रवार (7 अगस्त) को निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने माना कि निजी अस्पतालों द्वारा बच्ची को समय पर आपातकालीन प्राथमिक उपचार न देने के कारण ही उसकी मौत हुई थी। अदालत ने सेंट जोसेफ (मरियम) सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल को 10 लाख रुपये और खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर को 2 लाख रुपये का हर्जाना पीड़ित परिवार को चार सप्ताह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया है।
अस्पतालों की संवेदनहीनता के कारण तड़प-तड़प कर हुई बच्ची की मौत: एसआईटी
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट में इन अस्पतालों की घोर लापरवाही उजागर हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, दुष्कर्म के बाद बच्ची लगातार पांच घंटे तक जीवित रही और उसका लगातार खून बहता रहा। एसआईटी ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों निजी अस्पतालों द्वारा तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता देने से साफ इनकार करना ही बच्ची की मौत की सीधी वजह बना था। यदि समय रहते उसे प्राथमिक इलाज मिल जाता, तो उसकी जान आसानी से बचाई जा सकती थी। पीड़ित बच्ची का पिता एक दिहाड़ी मजदूर है, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्ते के भीतर इस मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया है।
16 मार्च को पड़ोसी ने बहला-फुसलाकर किया था अगवा
यह दर्दनाक घटना इसी साल 16 मार्च की है, जब गाजियाबाद में चार साल की मासूम बच्ची को उसके एक पड़ोसी ने बहला-फुसलाकर अगवा कर लिया था। बच्ची के काफी समय तक घर वापस न आने पर उसके पिता ने उसकी खोजबीन शुरू की। खोज के दौरान पिता ने बच्ची को एक जगह बेहोशी और लहूलुहान हालत में पड़ा पाया।
परिजनों ने तुरंत उसे पास के सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल और खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर पहुंचाया। लेकिन इन दोनों निजी अस्पतालों ने बच्ची की नाजुक हालत देखकर भी उसे भर्ती करने या आपातकालीन उपचार देने से साफ मना कर दिया। इसके बाद बेबस परिजन उसे आनन-फानन में गाजियाबाद के एक सरकारी अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया।
गाजियाबाद पुलिस के संवेदनहीन रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार
अपनी मासूम बेटी को खोने के बाद न्याय के लिए भटक रहे पीड़ित पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। पिता ने याचिका दाखिल कर पूरे मामले की अदालत की निगरानी में एसआईटी या केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की गुहार लगाई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान 10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस के संवेदनहीन और ढुलमुल रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने पाया कि स्थानीय पुलिस ने शुरुआत में मामला दर्ज (FIR) करने में आनाकानी की थी और मामले की ठीक से जांच नहीं की। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार, स्थानीय पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी (SHO), कार्यकारी मजिस्ट्रेट और दोनों निजी अस्पतालों को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
गंभीर अपराधों के पीड़ितों के इलाज के लिए कोर्ट बनाएगा व्यापक गाइडलाइन
इस मामले में आर्थिक मुआवजे का आदेश देने के साथ ही सर्वोच्च अदालत ने एक और बड़ी घोषणा की है। पीठ ने कहा कि वह भविष्य में ऐसी दुखद घटनाओं को रोकने के लिए चिकित्सा संस्थानों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों (पुलिस) के लिए व्यापक और कड़े दिशानिर्देश (गाइडलाइन्स) तैयार करेगी।
इन दिशानिर्देशों के तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि गंभीर आपराधिक वारदातों के शिकार पीड़ितों को देश के किसी भी अस्पताल में तुरंत बिना किसी कानूनी अड़चन या देरी के आपातकालीन प्राथमिक उपचार मिले, ताकि समय रहते उनकी जान बचाई जा सके।
FAQ:
Q1: सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के किन दो निजी अस्पतालों पर और कितना मुआवजा लगाया है?
A1: सुप्रीम कोर्ट ने चार साल की दुष्कर्म पीड़िता को इलाज देने से इनकार करने पर सेंट जोसेफ (मरियम) सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल पर 10 लाख रुपये और खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर पर 2 लाख रुपये (कुल 12 लाख रुपये) का मुआवजा लगाया है।
Q2: इस मामले में एसआईटी (SIT) की जांच रिपोर्ट में क्या बातें सामने आईं?
A2: सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी की रिपोर्ट से पता चला कि दुष्कर्म के बाद बच्ची करीब पांच घंटे तक जीवित थी और उसका खून बह रहा था। दोनों निजी अस्पतालों द्वारा उसे समय पर आपातकालीन प्राथमिक उपचार न देने के कारण ही उसकी मौत हो गई।
Q3: सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस के व्यवहार को लेकर क्या टिप्पणियां की थीं?
A3: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस के संवेदनहीन रवैये की कड़ी आलोचना की थी। कोर्ट ने कहा था कि पुलिस ने शुरुआत में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में ढिलाई बरती और मामले की ठीक से जांच करने में पूरी तरह लापरवाही दिखाई थी।

