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Join NowUP Assembly Election : उत्तर प्रदेश की राजनीति के बारे में एक बात बिल्कुल पक्की है— यहां चुनावी सुगबुगाहट कभी खत्म नहीं होती। भले ही यूपी विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2027) में अभी अच्छा-खासा वक्त बचा हो, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी बीच, पूर्वांचल के मऊ (Mau) जिले से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरे प्रदेश के सियासी पारे को गरमा दिया है।
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (Lok Janshakti Party) ने मऊ में अपने ‘मिशन 2027’ का शंखनाद कर दिया है। लेकिन इस कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय पार्टी का कोई नारा नहीं, बल्कि मंच पर बैठा एक खास चेहरा रहा। यह चेहरा है बाहुबली और दिवंगत नेता मुख्तार अंसारी (Mukhtar Ansari) की मुंहबोली बहन डॉ. अलका राय (Alka Rai) का। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि अलका राय की इस नई सियासी पारी के क्या मायने हैं और यूपी में इसका क्या असर पड़ने वाला है।
कौन हैं डॉ. अलका राय और क्यों हो रही है इतनी चर्चा?
अगर आप पूर्वांचल की राजनीति और खबरों पर नजर रखते हैं, तो डॉ. अलका राय कोई अनजान नाम नहीं हैं। मऊ और उसके आसपास के इलाके में वे एक बहुत ही जानी-मानी गायनोलॉजिस्ट (Gynecologist) हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इलाके के लोग उन्हें माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की ‘मुंहबोली बहन’ के रूप में जानते हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी कि डॉ. अलका राय कभी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रदेश कोर कमेटी की अहम पदाधिकारी हुआ करती थीं। उनका राजनीतिक कद अच्छा खासा था, लेकिन फिर एक ऐसा विवाद सामने आया जिसने उनके पूरे सियासी करियर पर ब्रेक लगा दिया।
कैसे हुआ ‘एंबुलेंस कांड’ और बीजेपी से किनारा?
अलका राय की जिंदगी में सबसे बड़ा भूचाल तब आया जब यूपी के बाराबंकी का चर्चित ‘एंबुलेंस प्रकरण’ सामने आया। इस हाई-प्रोफाइल मामले में अलका राय का नाम सह-आरोपी (Co-accused) के रूप में दर्ज हुआ। जैसे ही उनका नाम मुख्तार अंसारी से जुड़े इस मामले में उछला, बीजेपी ने तुरंत उनसे दूरी बना ली।
मामला इतना गंभीर था कि डॉ. अलका राय को जेल तक जाना पड़ा। फिलहाल वे जमानत पर बाहर हैं, लेकिन उनके खिलाफ अभी भी गैंगस्टर एक्ट सहित कई गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज हैं, जिनकी सुनवाई बाराबंकी की अदालत में चल रही है। अपने राजनीतिक करियर को खत्म होता देख अलका राय लंबे समय तक शांत रहीं, लेकिन अब उन्होंने वापसी का एक नया रास्ता खोज लिया है।
लोजपा के मंच से नई सियासी पारी की शुरुआत
30 अप्रैल की शाम मऊ नगर क्षेत्र में चिराग पासवान की पार्टी (LJP) की एक बड़ी और अहम बैठक हुई। इसी बैठक में डॉ. अलका राय ने आधिकारिक तौर पर लोक जनशक्ति पार्टी का दामन थाम लिया। जब वे मंच पर आकर बैठीं, तो वहां मौजूद हर शख्स हैरान रह गया।
इस अहम बैठक की अध्यक्षता बिहार के पूर्व मंत्री संजय पासवान ने की। इस कार्यक्रम में मऊ के जिला अध्यक्ष कल्याण कुमार त्रिपाठी सहित डॉ. सर्वजीत शर्मा, राजीव राय, आलोक राय और अमित मौर्या जैसे पार्टी के कई बड़े चेहरे मौजूद रहे। इस बैठक का मुख्य एजेंडा ही संगठन को मजबूत करना और बूथ स्तर पर 2027 की तैयारियां शुरू करना था।
क्या है चिराग पासवान का यूपी वाला ‘गेमप्लान’?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि केंद्र में एनडीए (NDA) की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी आखिर यूपी में क्या खिचड़ी पका रही है?
दरअसल, चिराग पासवान जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता छोटे-छोटे दलों और खास जातियों के समीकरण से होकर गुजरता है। लोजपा अब यूपी में अपने संगठन का विस्तार करने के लिए ऐसे नए और चर्चित चेहरों को आगे ला रही है, जिनका जमीन पर अपना एक अलग प्रभाव हो। पूर्वांचल में दलित वोट बैंक के साथ-साथ अलका राय जैसे चेहरों के जरिए पार्टी एक नया ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का ताना-बाना बुनने की कोशिश कर रही है।
छोटे दल करेंगे बड़ा ‘खेला’?
मऊ में हुई लोजपा की इस बैठक ने एक बात तो बिल्कुल शीशे की तरह साफ कर दी है कि 2027 के चुनाव से पहले छोटे राजनीतिक दल भी यूपी में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। अलका राय का एलजेपी (LJP) में आना यह संकेत देता है कि आने वाले समय में यूपी के सियासी समीकरण तेजी से बदलेंगे। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या विवादों में घिरी डॉ. अलका राय चिराग पासवान की पार्टी को यूपी में वह संजीवनी दे पाएंगी, जिसकी उन्हें तलाश है?


