SC-ST Promotion Roster Rules: 90% आबादी की 0% हिस्सेदारी? बैंकों के बड़े पदों पर दलितों की नो-एंट्री का वो काला सच

Published On: March 30, 2026
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SC-ST Promotion Roster Rules: 90% आबादी की 0% हिस्सेदारी? बैंकों के बड़े पदों पर दलितों की नो-एंट्री का वो काला सच

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SC-ST Promotion Roster Rules: अक्सर हम सुनते हैं कि आरक्षण के जरिए पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ाया जा रहा है, लेकिन क्या वाकई उन्हें वो सम्मान और पद मिल रहा है जिसके वे हकदार हैं? हाल ही में ‘जनसंसद’ के दौरान ग्रामीण बैंक के SC-ST Welfare Association के प्रतिनिधिमंडल से हुई मुलाकात ने एक ऐसी कड़वी हकीकत को उजागर किया है, जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। यह कहानी केवल भेदभाव की नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर छिपे उस ‘नीतिगत अन्याय’ की है, जो बहुजन समाज को शीर्ष तक पहुँचने से रोकता है।

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बड़े पदों पर ‘अघोषित पाबंदी’: आखिर कहाँ हैं हमारे अधिकारी?

प्रतिनिधिमंडल के साथियों ने जब अपनी आपबीती सुनाई, तो वही बात फिर से साबित हुई जिसे मैं हमेशा से उठाता रहा हूँ—देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं के Senior Positions (शीर्ष पदों) पर बहुजनों की हिस्सेदारी न के बराबर है। सरकारी रिकॉर्ड में भले ही सब कुछ ठीक दिखे, लेकिन हकीकत यह है कि जब बात नेतृत्व और निर्णय लेने वाले पदों की आती है, तो वहां एक ‘अदृश्य दीवार’ खड़ी कर दी जाती है।

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रोस्टर का उल्लंघन और ‘मेरिट’ का बहाना

ग्रामीण बैंकों में पदोन्नति (Promotion) के लिए स्पष्ट नियम और Roster System मौजूद है। नियम कहता है कि आरक्षण के आधार पर प्रमोशन में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। लेकिन प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि असल खेल तो Performance और Merit के नाम पर होता है।

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  1. जब भी किसी दलित या आदिवासी कर्मचारी के प्रमोशन की बारी आती है, तो जानबूझकर उनकी ‘परफॉरमेंस’ को कम आंक दिया जाता है।

  2. ‘मेरिट’ को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है ताकि योग्य होने के बावजूद इन वर्गों के अधिकारियों को पीछे धकेला जा सके।
    यह एक ऐसा नीतिगत भेदभाव है, जिसे पकड़ पाना मुश्किल है लेकिन इसके परिणाम लाखों कर्मचारियों के भविष्य को अंधकार में डाल रहे हैं।

आवाज उठाने पर ‘सजा’: सुदूर क्षेत्रों में तबादले का डर

हैरानी की बात तो यह है कि जो संगठन या पदाधिकारी इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से सुनने के बजाय चुप कराने की कोशिश की जाती है। दलित-आदिवासी संगठनों के पदाधिकारियों को सजा के तौर पर सुदूर क्षेत्रों (Remote Areas) में ट्रांसफर दे दिया जाता है। बार-बार तबादले करके उनके मनोबल को तोड़ने की कोशिश की जाती है ताकि भविष्य में कोई भी अपनी हिस्सेदारी की बात न कर सके।

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एंट्री लेवल पर नौकरी, लेकिन ऊपर का रास्ता बंद

यह एक कड़वा सच है कि आरक्षण के कारण इन समुदायों को Entry Level यानी क्लर्क या निचले स्तर के पदों पर नौकरियां तो मिल जाती हैं, लेकिन जैसे-जैसे सीढ़ी ऊपर जाती है, उनके लिए रास्ते बंद कर दिए जाते हैं। बैंकों के मैनेजमेंट और टॉप पदों पर आज भी दलितों और आदिवासियों को पहुँचने का मौका नहीं दिया जा रहा है।

अन्याय के खिलाफ अब होगी आर-पार की लड़ाई

प्रतिनिधिमंडल की इन बातों को जानकर गहरा दुख हुआ, लेकिन आश्चर्य बिल्कुल नहीं हुआ क्योंकि यह सिस्टम की पुरानी बीमारी है। इसी भेदभाव और अन्याय के खिलाफ हम लड़ रहे हैं। हमारा उद्देश्य स्पष्ट है—देश के हर वर्ग को, चाहे वह दलित हो, आदिवासी हो या पिछड़ा, उसे हर संस्था में उसकी आबादी के अनुपात में बराबर की हिस्सेदारी और भागीदारी मिलनी चाहिए। हम मिलकर इस व्यवस्था को बदलेंगे। ‘हिससेदारी’ की यह जंग तब तक जारी रहेगी, जब तक ग्रामीण बैंक से लेकर देश की सर्वोच्च संस्थाओं तक बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं हो जाता।

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