Akhilesh Yadav Dadri Rally: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय ‘मिशन 2027’ की हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने 29 मार्च को ग्रेटर नोएडा के दादरी में एक ऐसी रैली की, जिसने न केवल विरोधियों की नींद उड़ा दी है, बल्कि पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरणों को भी पूरी तरह बदल कर रख दिया है। 140 विधानसभा सीटों को साधने के लिए अखिलेश ने इस बार जो रणनीति अपनाई है, वह सीधे तौर पर ‘गुर्जर कार्ड’ और ‘इतिहास के गौरव’ से जुड़ी है।
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पश्चिमी यूपी की 140 सीटों पर सपा की नजर
दादरी की इस रैली का मकसद साफ था—पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र बनना। कार्यक्रम की कमान राजकुमार भाटी और अतुल प्रधान जैसे कद्दावर गुर्जर नेताओं के हाथों में थी, जो इस बात का संकेत है कि अखिलेश यादव अब पूरी तरह से ‘जाट-मुस्लिम-गुर्जर’ गठजोड़ को मजबूत करने में जुट गए हैं। मंच पर जब अखिलेश यादव ने गुर्जरों की शान और पहचान मानी जाने वाली ‘पगड़ी’ पहनी, तो जनता का उत्साह सातवें आसमान पर था। यह सिर्फ एक वस्त्र नहीं, बल्कि इस समाज के साथ अपनेपन का एक सीधा संदेश था।
मायावती के गढ़ में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
अखिलेश यादव की इस रैली की सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि रैली स्थल से चंद कदमों की दूरी पर बसपा सुप्रीमो मायावती का पैतृक गांव बादलपुर स्थित है। मायावती के किले में घुसकर अखिलेश ने जो ‘लंच डिप्लोमेसी’ की, उसने सबको चौंका दिया।
रैली के बाद अखिलेश सीधे गजराज सिंह नागर के आवास पर पहुंचे। गौर करने वाली बात यह है कि गजराज सिंह कभी मायावती के बेहद भरोसेमंद सिपाही हुआ करते थे, जो 2022 के चुनावों के बाद सपा का दामन थाम चुके हैं। नागर के घर पर फूलों से भव्य स्वागत और बंद कमरे में गुर्जर समाज के प्रमुख नेताओं के साथ हुई लंबी बैठक ने दिल्ली से लखनऊ तक सियासी गलियारों में सुगबुगाहट तेज कर दी है।
सम्राट मिहिर भोज और 2027 का महा-वादा
अखिलेश यादव जानते हैं कि पश्चिमी यूपी में भावनाओं का कितना महत्व है। मंच से उन्होंने न केवल सम्राट मिहिर भोज को पुष्पांजलि अर्पित की, बल्कि एक बड़ा चुनावी वादा भी किया। उन्होंने कहा, “जब भी हमें मौका मिला, हमने सम्मान दिया है। चाहे वो विजय सिंह पथिक के नाम पर स्टेडियम हो या मिहिर भोज के नाम पर पार्क। लेकिन 2027 में अगर हमारी सरकार बनी, तो लखनऊ के आलीशान रिवर फ्रंट पर सम्राट मिहिर भोज और कोतवाल धनसिंह गुर्जर की भव्य प्रतिमाएं और स्मारक बनवाए जाएंगे।”
अखिलेश ने उस विवाद को भी हवा दी जिसमें गुर्जर समाज के इतिहास को कथित तौर पर बदलने की कोशिश की गई थी। उन्होंने याद दिलाया कि जब समाज के इतिहास पर आंच आई, तो समाजवादी पार्टी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही।
क्या बदलेगा हवा का रुख?
अखिलेश यादव का यह ‘गुर्जर प्रेम’ और मायावती के गढ़ में उनकी सक्रियता यह बताती है कि सपा अब केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं रहना चाहती। सम्राट मिहिर भोज के सम्मान और लखनऊ में स्मारक का वादा एक ऐसा दांव है, जो भाजपा और बसपा दोनों के लिए बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। अब देखना यह होगा कि 2027 के रण में यह ‘पगड़ी’ सपा को सत्ता के सिंहासन तक पहुँचाती है या नहीं।

