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Join NowChief Election Commissioner: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के बीच हुई हालिया तल्खी ने देश के राजनीतिक गलियारों में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है। ममता बनर्जी ने न केवल चुनाव आयुक्त पर भाजपा की भाषा बोलने का आरोप लगाया, बल्कि उनके बर्ताव को ‘अपमानजनक’ बताते हुए बैठक से वॉकआउट भी कर दिया। इस घटना के बाद से एक बड़ा सवाल पूरे देश में गूँज रहा है—क्या भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाया जा सकता है? और यदि हाँ, तो इसकी प्रक्रिया क्या है?
विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच बढ़ती दरार
पिछले कुछ महीनों से चुनाव आयोग और विपक्षी दलों (INDIA Alliance) के बीच तनाव चरम पर है। विवाद की मुख्य जड़ ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी मतदाता सूची का पुनरीक्षण है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का गंभीर आरोप लगाया है। उनका दावा है कि जानबूझकर असली मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं और फर्जी नामों को सूची में शामिल किया जा रहा है। इसी नाराजगी के चलते विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ‘महाभियोग’ (Impeachment) प्रस्ताव लाने की संभावनाओं पर भी चर्चा की है।
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संवैधानिक कवच: क्यों आसान नहीं है हटाना?
भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। हमारे संविधान निर्माताओं ने इसे सरकार के दबाव से मुक्त रखने के लिए विशेष प्रावधान किए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उतनी ही कठिन है जितनी कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज को हटाने की।
संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से केवल दो ही स्थितियों में हटाया जा सकता है:
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साबित कदाचार (Proven Misbehavior): यदि उन पर कोई गंभीर दुर्व्यवहार या भ्रष्टाचार साबित हो जाए।
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अक्षमता (Incapacity): यदि वे शारीरिक या मानसिक रूप से पद संभालने के योग्य न रहें।
हटाने की प्रक्रिया: संसद के हाथ में है चाबी
मुख्य चुनाव आयुक्त को राष्ट्रपति सीधे आदेश देकर नहीं हटा सकते। इसके लिए संसद में एक जटिल प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसे ‘महाभियोग जैसी प्रक्रिया’ कहा जाता है:
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प्रस्ताव: सबसे पहले लोकसभा या राज्यसभा में उन्हें हटाने का प्रस्ताव लाया जाता है।
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विशेष बहुमत (Special Majority): इस प्रस्ताव को पास करने के लिए सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित होकर वोट देने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई (2/3rd) समर्थन अनिवार्य है।
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दोनों सदनों की मंजूरी: यह प्रस्ताव दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से अलग-अलग पास होना चाहिए।
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राष्ट्रपति की मुहर: संसद से पास होने के बाद ही राष्ट्रपति उन्हें पदमुक्त करने का आदेश जारी कर सकते हैं।
यही कारण है कि आज तक भारत के इतिहास में किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया के जरिए हटाया नहीं जा सका है।
मुख्य चुनाव आयुक्त बनाम अन्य चुनाव आयुक्त (The Difference)
यहाँ एक दिलचस्प कानूनी पेच है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को तो जज जैसी सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन अन्य चुनाव आयुक्तों (ECs) के लिए नियम थोड़े अलग हैं। अन्य आयुक्तों को हटाने के लिए महाभियोग की जरूरत नहीं होती। उन्हें राष्ट्रपति केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर पद से हटा सकते हैं।
लोकतंत्र की कसौटी पर चुनाव आयोग
ममता बनर्जी का गुस्सा और विपक्ष के आरोप यह संकेत देते हैं कि आने वाले चुनाव निष्पक्षता की बड़ी अग्निपरीक्षा होंगे। जहाँ विपक्ष इसे लोकतंत्र बचाने की लड़ाई कह रहा है, वहीं संविधान चुनाव आयोग को वह सुरक्षा कवच देता है ताकि वह बिना किसी राजनीतिक डर के अपना काम कर सके। लेकिन जब सवाल ‘अपमान’ और ‘एकपक्षीय व्यवहार’ का हो, तो मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक भी हो जाता है।












